मुख्य पटल श्री ओम थानवी (कुलपति)

श्री ओम थानवी

संस्थापक-कुलपति

हरिदेव जोशी पत्रकारिता और जनसंचार विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति श्री ओम थानवी जाने-माने संपादक और सम्मानित बौद्धिक शख़्सियत हैं।

तैंतालीस वर्षों के पत्रकार-जीवन में श्री थानवी ने लेखक, वक्ता और विचारक की ख्याति अर्जित की है। उनकी रुचि के क्षेत्रों में मीडिया के साथ साहित्य, कला, संस्कृति, रंगमंच और सिनेमा से लेकर इतिहास, नृतत्त्वशास्त्र, समाजविज्ञान और पर्यावरण तक शामिल हैं।

श्री थानवी ने पत्रकारिता की शुरुआत 1977 में बीकानेर में छात्र जीवन के दौरान की। व्यवसाय प्रशासन में एमकॉम करने के बाद वे 1980 में जयपुर में पत्रिका समूह से जुड़े। साप्ताहिक इतवारी पत्रिका और फिर राजस्थान पत्रिका के बीकानेर संस्करण के सम्पादकीय प्रभारी रहने के बाद 1989 में इंडियन एक्सप्रेस समूह से जुड़ते हुए जनसत्ता के स्थानीय संपादक होकर चंडीगढ़ चले गए। दस साल बाद दिल्ली में कार्यकारी संपादक के रूप में जनसत्ता के सम्पूर्ण संपादन का ज़िम्मा संभाला। 16 वर्षों के संपादन काल में उन्होंने इस प्रतिष्ठित समाचार पत्र के उच्च मानकों की विरासत को समृद्ध किया।

नैतिक मूल्यों के साथ भाषा और साहित्य के अनुराग तथा समाज, राजनीति और संस्कृति से प्रतिबद्ध सरोकार ने जनसत्ता की अलग बौद्धिक पहचान बनाई। छब्बीस साल बाद 2015 में श्री थानवी इस समाचार पत्र से सेवानिवृत हुए। फिर कुछ समय के लिए विज़िटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के मीडिया अध्ययन केंद्र (सामाजिक विज्ञान संस्थान) में पत्रकारिता का अध्यापन किया। हरिदेव जोशी विश्वविद्यालय आरम्भ करने से पहले वे दिल्ली में राजस्थान पत्रिका के सलाहकार संपादक भी रहे।

मीडिया के विभिन्न रूपों — पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो-टीवी, ऑनलाइन पत्रकारिता और सोशल मीडिया आदि — को उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। सम-सामयिक मुद्दों के अलावा उन्होंने भाषा, साहित्य, कला, सिनेमा, पुरातत्त्व, वास्तुशिल्प आदि पर भी महत्त्वपूर्ण लेख लिखे हैं।

अकादमिक उन्मुखता

श्री थानवी ने देश और विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों और शैक्षिक संस्थाओं में पत्रकारिता, भाषा, पर्यावरण और अन्य विषयों पर व्याख्यान दिए हैं। इनमें दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, राजस्थान विश्वविद्यालय, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता और संचार विश्वविद्यालय, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, गुलबर्गा विश्वविद्यालय, पांडेचेरी विश्वविद्यालय, तोक्यो विश्वविद्यालय, जगेलोनियन विश्वविद्यालय, क्राकोव (पोलैंड), भारतीय विद्याभवन, न्यूयॉर्क, एशियाटिक सोसाइटी, कोलकाता और विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सीएसई) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान शामिल हैं।

वैचारिक सहभागिता

वैचारिक आयोजनों में श्री थानवी निरंतर शिरकत करते आए हैं। उन्होंने साउथ एशिया फ्री मीडिया एसोसिएशन के दिल्ली, काबुल, कोलंबो, कॉक्स बाज़ार (बांग्लादेश), काठमांडू और लाहौर में आयोजित हुए सम्मेलनों में हिस्सा लिया। पैनोस साउथ एशिया द्वारा नगरकोट (नेपाल), बेलाज्जो (इटली), इस्तांबुल और ब्रसेल्स में आयोजित संपादकों के सम्मेलनों, विश्व संपादक फोरम और विश्व समाचार-पत्र संगठन द्वारा हैदराबाद में आयोजित संपादक सम्मेलन, एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म, पैनोस और ब्रिटिश उच्चायोग के संयुक्त तत्वावधान में चेन्नई में आयोजित मीडिया, जनहित और नियमन संगोष्ठी और देश-विदेश में सार्क लेखक फाउंडेशन के विभिन्न संवादों में भागीदारी की है। वे प्रवासी मज़दूरों की समस्याओं पर डैड-सी (जॉर्डन) में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) और अदीस अबाबा (इथियोपिया) में विकास के लिए वित्त विषय पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आयोजित संगोष्ठी में भी संभागी रहे। देश की शीर्ष ख्यातनाम संस्थाओं यथा गांधी शांति प्रतिष्ठान (जीपीएफ), विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस), साहित्य अकादेमी, केंद्रीय हिंदी संस्थान, भारतीय भाषा परिषद्, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी), भारतीय फिल्म और टेलिविजन संस्थान (एफटीआईआई), रज़ा न्यास, इंडिया इंटरनेशन सेंटर, भारतीय पर्यावास केंद्र, पीयूसीएल, सहमत और अनहद आदि के विमर्शों में भी विचार व्यक्त किए हैं।

पेशेवर भागीदारी

श्री थानवी मीडिया प्रतिनिधि के नाते पर्यावरण, समाज विज्ञान और कला-संस्कृति पर दुनिया के लगभग सभी महाद्वीपों में गए हैं। अनेक अहम आयोजनों की रिपोर्टिंग और समालोचना की है। विशेष रूप से उन्होंने 1992 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जलवायु परिवर्तन पर रियो द जनेरो (ब्राज़ील) में आयोजित प्रथम पृथ्वी-सम्मेलन और उस धारा में कोपेनहेगन, कानकुन (मैक्सिको), डरबन, दोहा, वारसा, लीमा (पेरू), पेरिस, माराकेश (मोरक्को), बॉन (जर्मनी) और कातोवित्से (पोलैंड) में हुए पर्यावरण सम्मेलनों में शिरकत की। मुंबई, ट्यूनिस और हेलसिंकी (फिनलैंड) में आयोजित विश्व सामाजिक मंच (डब्लूएसएफ) के सम्मेलनों और भोपाल, न्यूयॉर्क और पारामारिबो (सूरीनाम) में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलनों में भी हिस्सा लिया। वे साहित्य अकादेमी के प्रतिनिधिमंडल में हवाना (क्यूबा) के सांस्कृतिक सम्मेलन में गए। भारत के उपराष्ट्रपति के दल में बुख़ारेस्ट (रोमानिया), जॉर्जटाउन (गयाना), पोर्ट ऑफ़ स्पेन (त्रिनिदाद-टोबेगो), येरेवान (आर्मीनिया), मिंस्क (बेलारूस), पेरिस और लंदन आदि में आयोजित कार्यक्रमों में भी शामिल हुए। ब्रिटेन शासन के आमंत्रण पर संपादकों के समूह के साथ इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड की यात्रा की। उन्होंने मिस्र, यूनान, चीन, हंगरी, चेक गणराज्य, स्लोवाकिया, ऑस्ट्रिया, कनाडा, मलेशिया, थाईलैंड, मॉरीशस, स्पेन, स्वीडन, स्विट्ज़रलैंड आदि देशों की भी यात्रा की है और अनेक संस्मरण लिखे हैं।

प्रकाशन

सिंधु घाटी सभ्यता के महान केंद्र मोहनजोदड़ो पर लिखी उनकी पुस्तक मुअनजोदड़ो (2008) आलोचकों द्वारा बहुत सराही गई है। इस पर उन्हें प्रतिष्ठित सार्क साहित्य सम्मान से नवाज़ा गया। हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के शलाकापुरुष सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की जन्मशती (2011) पर श्री थानवी ने अपने-अपने अज्ञेय नाम से दो स्मृति ग्रंथों का संपादन किया। उन्होंने पुरुषोत्तम अग्रवाल के साहित्य और आलोचनात्मक अवदान पर कहा-अनकहा (2015) का संपादन भी किया है। समकालीन मुद्दों पर अनंतर तथा कला और सिनेमा पर रूप-अरूप उनके प्रकाश्य निबंध-संग्रह हैं।

सम्मान

हिंदी पत्रकारिता में योगदान के लिए श्री थानवी को 2003 में भारत के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने प्रतिष्ठित गणेशशंकर विद्यार्थी पुरस्कार से सम्मानित किया। लेखन के लिए उन्हें सार्क साहित्य सम्मान (2012), शमशेर सम्मान (2013), महाकवि बिहारी सम्मान (2015) और पत्रकारिता के लिए हल्दीघाटी सम्मान (2003), माधवराव सप्रे राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार (2014) और हिंदी अकादमी पुरस्कार (2016) से भी सम्मानित किया गया है।