मुख्य पटल एमए-जेएमसी: विकास-संचार और सामाजिक कार्य

एमए-जेएमसी: विकास-संचार और सामाजिक कार्य

विकास संचार और सामाजिक कार्य के इस संयुक्त अध्ययन में एक दोहरी नवीनता निहित है। इस तरह के पाठ्यक्रम की संकल्पना संभवत: पहली बार की गई है। दूसरे, इसके ज़रिये दोनों विचारों के वैश्विक और राष्ट्रीय इतिहास की रोशनी में विकास की मौजूदा अवस्था और उसमें संचार की भूमिका के परस्पर निर्भर सूत्रों पर एक गहरी निगाह डालने का मौक़ा मिलता है। विकास की आधिकारिक परिभाषा पश्चिम के युद्घोत्तर काल की प्रगति के आईने में गढ़ी गई थी। एशिया, अफ़्रीका तथा लातीनी अमेरिका के देशों ने अपने आर्थिक पिछड़ेपन से छुटकारा पाने और आधुनिकता के युग में समस्याहीन ढंग से छलांग लगाने के लिए इस थमाये गये विचार को अपनाया। शुरुआती दौर में यह मॉडल उन देशों में थोड़ा कामयाब भी रहा, लेकिन जल्दी ही वह एक ऐसे व्यावहारिक और सैद्घांतिक संकट में फँस गया जिससे वह आज तक पूरी तरह नहीं उबर पाया है। लेकिन, इससे पहले कि विकास के इस पश्चिमी मॉडल का अंत होता, भूमंडलीकरण ने इसे नया जीवन दे दिया। इस बार इसका आगमन संचार-क्रांति पर सवार होकर हुआ।

उत्तर-औपनिवेशिक भारत ने भी विकास के नए रास्ते पर चलने की योजना पर अमल किया। आधुनिक विकास की इस मुहिम में जनता की ज़रूरतों को समझने तथा राष्ट्रीय योजनाओं पर आम सहमति तैयार करने के लिए संचार का एक देशव्यापी नेटवर्क तजवीज़ किया गया। मानव विकास की इस सूचना-बहुल रणनीति का दारोमदार मानव संसाधनों को प्रभावी ढंग से प्रशिक्षित करने और उन्हें कारगर बना सकने वाली प्रक्रियाओं की खोज व क्रियान्वयन पर टिका था। इस अर्थ में समाज में सूचना का प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए संचार की एक आधारभूत संरचना का निर्माण एक ज़रूरी क़दम था। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारतीय राज्य ने सघन उद्योगीकरण का रास्ता अपनाया। इसमें कोई शक नहीं कि विशाल आबादी और अपरम्पार बहुलता से सम्पन्न पारम्परिक समाज के जटिल परिदृश्य को देखते हुए भारतीय राज्य द्वारा चुना गया विकास का यह रास्ता प्रशंसनीय उपलब्धियों से भरा है। कहना न होगा कि इस मामले में वह राजकीय क्षेत्र पर अतिनिर्भरता, सामाजिक भागीदारी में सुस्ती तथा व्यवस्थागत अड़चनों से भी ग्रस्त रहा है। लेकिन, इस एजेंडे पर चलने के लिए भारतीय राज्य के पास लोकोपकारी नीतियों का एक सकारात्मक एजेंडा था, इसलिए इन दि़क़्कतों के बावजूद राष्ट्रीय उत्साह पर कोई आँच नहीं आई। परिणामस्वरूप भारत अंतर-राष्ट्रीय मंच पर एक सम्मानजनक स्थान ग्रहण करने में सफल रहा।

एक अर्थ में दुनिया के अन्य देशों के बरक्स भारत का यह अनुभव अनूठा कहा जा सकता है, क्योंकि विश्व के अन्य नव-स्वाधीन देश न पूँजीवादी वृद्घि का पर्याप्त स्तर छू पाए, न ही सामाजिक न्याय की नींव रख पाए। उन देशों में विकास की रणनीति के इस स्याह पक्ष को देख कर भारत में भी विद्वानों को जीवन की प्रकृति-सम्मत शैली और पारम्परिक विवेक की ओर मुड़ना पड़ा। इस मुकाम पर गाँधी, विनोबा, नेहरू, अम्बेडकर से लेकर पाउलो फ़्रेरे, इवान इलिच, मिशेल फ़ूको, वोल्फ़गांग सक़्स और आर्टुरो एस्कोबर जैसी विभूतियों द्वारा मुहैया कराये गये बुनियादी पाठों ने प्रमुख भूमिका निभाई।

हमारा यह पाठ्यक्रम ऐसा द्विआयामी अध्ययन है जो सामाजिक विकास और संचार के संदर्भ में मौजूदा दुनिया और उसकी वैश्विक राजनीति की चुनौतियों की एक गहरी समझ से लैस करता है। इसके ज़रिये छात्रों को अप-विकास, जलवायु-विशिष्टता आधारित खेती, छोटे किसानों और प्रवासी मज़दूरों की व्यथा, पृथ्वी के साझे तंत्र की व्यवस्था से संबंधित संकल्पनाओं, पारिस्थितिकीय आधुनिकता, हरित अर्थव्यवस्था, टिकाऊ विकास, अवरोही वृद्घि, प्राकृतिक स्वराज, लघुता की महत्ता, पारिस्थितिकीय लोकतंत्र तथा ऐसे ही अन्य विकल्पों की जानकारी मिलती है। यह पाठ्यक्रम इच्छुक विद्यार्थियों के लिए संकेत भी छोड़ता है कि तीसरी दुनिया के अधिकतर देशों की स्वास्थ्य-व्यवस्था जनता की ज़रूरतों का यथोचित हल क्यों नहीं ढूँढ़ पाती? वहाँ का चुनाव-तंत्र सामाजिक ऊँच-नीच की ता़कतों के बीच क्यों फँस गया है? प्रौढ़ शिक्षा साक्षरता क्रांति का पूर्ण मक़सद क्यों हासिल न कर सकी, और तीसरी दुनिया के देश और समाजों में विषमता की संरचनाएँ इतनी ताक़तवर क्यों दिखाई देती हैं?

इस संबंध में सामाजिक सेवा-कार्यों और संचार के बढ़ते दायरों की ओर ध्यान देना जरूरी है। सामाजिक संगठनों का अनुशासन विकास के लाभों को नियोजित ढंग से आम लोगों तक पहुँचाने में सुनिश्चित भूमिका निभा सकता है। भारत में बड़े पैमाने पर ग़ैर-सरकारी संगठन और तरह-तरह के सामाजिक आंदोलन इस कार्य में लगे हुए हैं। विकास के संदर्भ में सामाजिक कार्य एक बहुत बड़ी उम्मीद का प्रतिनिधित्व करता है। इसके ज़रिये सकारात्मक वैकासिक लक्ष्य वेधे जा सकते हैं।

मीडिया की नयी प्रोद्यौगिकी के प्रभाव में विकास का समग्र विचार एक नये परिप्रेक्ष्य में प्रवेश पा चुका है। तकनीक के क्षेत्र में विकसित होती नयी सम्भावनाओं के सहारे समतावादी लक्ष्यों की अधिक उपलब्धि और जातिगत अवरोधों व साम्प्रदायिक दकियानूसी के परे जाने की उम्मीद बँधती दिखाई देती है। ज़ाहिर है कि एक न्यायोचित और सेकुलर समाज की सम्भावना तब तक मूर्त नहीं हो सकती, जब तक संचार की नयी सैद्घांतिकी एक बेहतर दुनिया की संभावनाएं उपस्थित नहीं करती।

हमारे मौजूदा परिदृश्य में यह दोहरा पाठ्यक्रम विकास के संदर्भ में संचार के ऐसे ही ज़रूरी क्षितिजों का संधान करता है।

स्तर: स्नातकोत्तर

अवधि: दो वर्ष, चार सैमेस्टर

क्रेडिट: 120

सीट संख्या: 30

शैक्षणिक अर्हता: मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक उपाधि